जीवन की कहानी ....................
जीवन की किताब क्या लिखु..........
लिखने को कुछ है ही नही .........
फिर भी कुछ पन्नें भरने की सोची .............
जब जीवन के परदे खोले ..........
तो याद आयें कुछ ऐसे पल ......
जिनमें थी कुछ हसरतें ,कुछ उमंग....
जिनमें थी कुछ तरंग , थे कुछ साथी भूले से............................
पर जीवन की कथा बस ऐसे ही तो पूरी नही होती
नही आता मजा जब तक कोई उसमे व्यथा नही होती ............
अब मैंने सोचा की जीवन की कथा को अमर किया जाए
............
पर फिर वही किन्तु परन्तु कि बिना दुखांत के कथा अमर नही होती
और विडंबना है कि मुझे दुखांत भाता नही ...............................
सो इससे सिद्ध होता है कि एक साधारण जात की साधारण मनुष्य ठहरी और ऐसे महानुभावों की
जीवन कथा नही होती.........
होता है तो सिर्फ जीवन ............
इसलिए बन्धु बस जीना और केवल जीना है कोई कथा नही बनानी
कोई व्यथा नही सुनानी .....................
क्योंकि फिर वही कि
अमर नही होती हम जैसों की कहानी ........................
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